| ||समर्थ रामदासांचा दासबोध दशक १२ || |
| ||दशक बारावा : विवेकवैराग्य ||१२|| |
| समास पहिला : विमळ लक्षण |
| ||श्रीराम || |
| आधी प्रपंच करावा नेटका| मग घ्यावें परमार्थविवेका |येथें आळस करूं नका| विवेकी हो ||१|| |
| प्रपंच सांडून परमार्थ कराल| तेणें तुम्ही कष्टी व्हाल |प्रपंच परमार्थ चालवाल| तरी तुम्ही विवेकी ||२|| |
| प्रपंच सांडून परमार्थ केला| तरी अन्न मिळेना खायाला |मग तया करंट्याला| परमार्थ कैंचा ||३|| |
| परमार्थ सांडून प्रपंच करिसी|तरी तूं येमयातना भोगिसी |अंतीं परम कष्टी होसी|येमयातना भोगितां ||४|| |
| साहेबकामास नाहीं गेला| गृहींच सुरवडोन बैसला |तरी साहेब कुटील तयाला| पाहाती लोक ||५|| |
| तेव्हां महत्वचि गेलें| दुर्जनाचें हासें जालें |दुःख उदंड भोगिलें| आपुल्या जीवें ||६|| |
| तैसेचि होणार अंतीं| म्हणोन भजावें भगवंतीं |परमार्थाची प्रचिती| रोकडी घ्यावी ||७|| |
| संसारीं असतां मुक्त| तोचि जाणावा संयुक्त |अखंड पाहे युक्तायुक्त| विचारणा हे ||८|| |
| प्रपंची जो सावधान| तो परमार्थ करील जाण |प्रपंचीं जो अप्रमाण| तो परमार्थीं खोटा ||९|| |
| म्हणौन सावधपणें| प्रपंच परमार्थ चालवणें |ऐसें न करिता भोगणें| नाना दुःखें ||१०|| |
| पर्णाळि पाहोन उचले| जीवसृष्टि विवेकें चाले |आणि पुरुष होऊन भ्रमले| यासी काय म्हणावें ||११|| |
| म्हणौन असावी दीर्घ सूचना| अखंड करावी चाळणा |पुढील होणार अनुमाना| आणून सोडावें ||१२|| |
| सुखी असतो खबर्दार| दुःखी होतो बेखबर |ऐसा हा लोकिक विचार| दिसतचि आहे ||१३|| |
| म्हणौन सर्वसावधान| धन्य तयाचें महिमान |जनीं राखे समाधान| तोचि येक ||१४|| |
| चाळणेचा आळस केला| तरी अवचिता पडेल घाला |ते वेळे सावरायाला| अवकाश कैंचा ||१५|| |
| म्हणौन दीर्घसूचनेचे लोक| त्यांचा पाहावा विवेक |लोकांकरिता लोक| शाहाणे होती ||१६|| |
| परी ते शाहाणे वोळखावे| गुणवंताचे गुण घ्यावे |अवगुण देखोन सांडावे| जनामधें ||१७|| |
| मनुष्य पारखूं राहेना| आणि कोणाचें मन तोडीना |मनुष्यमात्र अनुमाना| आणून पाहे ||१८|| |
| दिसे सकळांस सारिखा| पाहातां विवेकी नेटका |कामी निकामी लोकां| बरें पाहे ||१९|| |
| जाणोन पाहिजेत सर्व| हेंचि तयाचें अपूर्व |ज्याचे त्यापरी गौरव| राखों जाणे ||२०|| |
| इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादेविमळलक्षणनाम समास पहिला ||१||१२. १ |
Sunday, 28 April 2013
| | समर्थ रामदासांचा दासबोध दशक १२ | |
आनुवांशिकी का जनक - ग्रेगर जॉन मेंडल
आनुवांशिकी का जनक -
ग्रेगर जॉन मेंडल
ग्रेगर
जॉन मेंडल
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Gregor Johann Mendel
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जन्म
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मृत्यु
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क्षेत्र
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वियना विश्वविद्यालय
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प्रसिद्धि
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आनुवांशिकी की
खोज के लिए
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ग्रेगर जॉन मेंडल (20
जुलाई, 1822[1] – 6
जनवरी, 1884) एक जर्मन भाषी ऑस्ट्रियाई औगस्टेनियन पादरी एवं वैज्ञानिक
था। उसे आनुवांशिकी का जनक कहा जाता है। उन्होंने मटर के दानों पर प्रयोग कर आनुवांशिकी के नियम निर्धारित किए
थे। उनके कार्यों की महत्ता बीसवीं शताब्दी तक नहीं पहचानी गई। उन नियमों की पुनर्खोज
ने उनका महत्व बताया।
== परिचय ==
आनुवंशिकता के जन्मदाता ग्रेगर जोहन मैण्डल का जन्म २२ जुलाई, सन् १८२२ ई। में मोराविया देश के एक साधारण कृषक परिवार में
हुआ था मारविया अब चैकोस्लावाकिया में है। बालक जोहन परिवार के खेतों में पौधों की
देखरेख में मदद किया करता था। इस कार्य में आपको विशेष आनन्द मिलता था। बचपन में
ही आप कृषक पिता से तरह-तरह के प्रश्न पूछा करते थे कि फूलों के अलग-अलग रंग और
रूप कहां से आते हैं। उनके पास पुत्र के ऐसे प्रश्नों के उत्तर नहीं थे। वे
बच्चे को उच्च शिक्षा दिलाना चाहते थे।
आप का परिवार निर्धनता के अभिशाप से घिरा था। फिर भी पिता ने खर्चे में
कतर-ब्योंत करके बेटे को जैसे तैसे चार वर्ष कालेज में पढ़ाया। जब आप इक्कीस वर्ष
के हुए, तो एक मठ में प्रविष्ठ हुए। सेंट ग्रेगरी
के सम्मान में आपने ग्रेगर नाम धारण किया।
आपने व्यवसाय अच्छा चुना था। मठ में मन रम गया था। आपके साथी भिक्षु प्रेमी
एवं बुद्धिमान लोग थे। वे धर्म से साहित्य तक और कला से विज्ञान तक सभी विषयों की
विवेचना में बड़ी दिलचस्पी लिया करते थे। उनका एक छोटा-सा हरा भरा बगीचा था, क्योंकि आपको पौधों में विशेष आनन्द आता था इसलिए आपको उसका अध्यक्ष
बना दिया। आपने इस के साथ-साथ अपना धार्मिक अध्ययन भी जारी रखा और सन् १८४७ ई। में
पादरी बन गए।
आपकी विज्ञान में रुची को देखकर, मठ ने आपको दो वर्ष के लिए वेनिस विश्वविद्यालय में भौतिकी पढ़ने के लिए
भेज दिया। जब वहां से अध्ययन पूरा करके लौटे तो, आल्तब्रून नगर, जहाँ आपका मठ था विद्यालय में भौतिकी
की देखभाल किया करते थे। इन सब से आपने भिक्षु कर्त्तव्यों में किसी प्रकार की कोई
बाधा नहीं पड़ती थी।
यहां भी आपने प्रश्न उठाने आरंभ किए जिन्हें आप पिता के खेत पर उठाया करते थे।
कुछ मटरें चिकनी और कुछ झुरींदार क्यों होती है? आप ऐसा क्या करें, जिससे कि केवल चिकनी मटर ही उगे।
कभी-कभी आप लाल फूलों के ही बीज बोते हैं, तो कुछ नए पौधों
में गुलाबी फूल क्यों आते हैं?
अंत में आपकी उत्सुकता की विजय हुई। आपने कुछ ऐसे प्रयोग करने का
निश्चय किया, जो वास्तव में विज्ञान से संबंधित थे। आपने
केवल कल्पना का सहारा नहीं लिया। आप प्रत्येक बात को ध्यान से देखा करते थे और
नोट करते जाते थे; क्योंकि मटर आसानी से उग आती थी।
इसलिए आपने मटर से प्रयोग किए। मटर की जिंदगी छोटी थी और आप बहुत-सी पीढ़ियों का
अध्ययन कर सकते थे।
आपने १८५६ तक के बीच मटर के १०,००० पौधे बोए और उनका
प्रेक्षण किया। आपने जिस तरह की समस्या हल करने का प्रयास किया उसका एक उदाहरण यह
है : मटर के एक ऊँचे और एक छोटे पौधे की संतान ऊँची होगी अथवा छोटी ? ऊँचे पौधे और छोटे पौधे से संतान प्राप्त करने के लिए आपने
ऊँचे पौंधे के फूल में से सुनहरी धूलि ली। आपने इसे छोटे पौधे की स्त्री के सिर पर
डाला। इससे जो बीज बने उन्हें आपने बोया। सब पौधे 'पिता'
पौधे की भाँति ऊँचे थे। आपने ऊँचेपन को प्रभावी लक्षण कहा है। जब इन
ऊँची संतानों के बच्चे हुए, उनके बीज उगाए गए, तो आपने पाया कि दूसरी पीढ़ी अथवा पौधों में सब पौधे ऊँचे नही थे। प्रति
तीन ऊँचे पौधों के पीछे एक पौधा छोटा था। इस छोटे पौधे को दादी की छोटाई
आनुवंशिकता में मिली थी। आपने छोटेपन को अप्रभावी लक्षण कहा।
इसी प्रकार आपने पीले बीजों की मटर को हरे बीजों के साथ संकरित किया। तब आप इस
निष्कर्ष पर पहुँचे कि उनसे उत्पन्न पहली पीढ़ी से सब पौधों के बीज पीले थे। उसमें
अगली पीढ़ी अर्थात् पौधों में तीन पीले और एक हरा था। यहां पीला प्रभावी और हरा
अप्रभावी लक्षण था। आपने इन्हीं प्रयोगों को असंख्य बार दुहराया पर फल वही निकला।
आठ वर्ष तक बड़ी सतर्कता के साथ कार्य करने के बाद, जब आप को पूर्ण विश्वास हो गया, तो आपने कहा कि
पौधों की आनुवंशिकता कुछ अमोघ अपरिवर्तनशील नियमों के अनुसार कार्य करती है।
निश्चय ही आप मनुष्यों पर इस प्रकार के प्रयोग नहीं कर सकते थे। इसलिए आप इस
स्थिति में नहीं थे कि इन नियमों को मानव की आनुवंशिकता पर लागू करें।
स्वाभाविक ही था कि आप अपने इन नए सिद्धान्तों के विषय में उत्तेजित हों। अब
आपने निश्चय किया कि समय आ गया है जब आपको संसार को बताना चाहिए, कि आपने किस बात का पता लगा लिया है। सन् १८६५ ई। में आपने एक
लेख लिखा और उसे नगर की वैज्ञानिक सभा के सामने पढ़ा: पर आपने महसूस किया कि कोई
भी आपकी बात को समझ नहीं पा रहा है। श्रोताओं ने नम्रतापूर्वक तालियाँ बजाई और जो
कुछ वहाँ सुना उसे तत्काल ही भूल गए। कदाचित् आप उन्हें अच्छी तरह समझा नहीं सके
थे। आपने घर लौटकर उस लेख को पुन: लिखा। कुछ सप्ताह बाद आपने उसे दूसरी सभा में
पढ़ा, पर यहाँ पर भी किसी श्रोता ने कोई रुचि नहीं ली। शायद
उन्होंने समझा हो कि मटर के पौधों से भी क्या कोई महत्त्वपूर्ण बात सिद्ध हो सकती
है। आपका भाषण एक छोटी-सी वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ। वह शीघ्र ही
पुस्तकालय की अल्मारियों में अपवित्र और अप्रशंसित तथा धूलि से ढक गया।इससे आप
निरूत्साहित हो उठे। कुछ दिन बाद आपने अपने साथी भिक्षुओं से कहा, "मेरा समय अवश्य एक दिन आएगा।"
आपको सन् १८६९ ई। में आपको मठ का ऐबट चुन लिया गया। अब आप मठ के कार्यों में
अधिक व्यस्त हो गए। अनुसंधान करने के लिए समय नहीं मिल पाया। ६ जनवरी, सन् १८८४ ई। को आपने सदा के लिए आँखें मूँद लीं। आपके निधन के
उपरांत लोगों ने आपको एक दयालु, परिश्रमी और छोटे भिक्षु के
रूप में स्मरण किया, जिसने अपना बहुत-सा समय अपने बगीचे में
मटर से उलझने में नष्ट कर दिया था। इस तरह आपके जीवन का कार्य- "मैण्डल का
आनुवंशिकता का नियम" अज्ञात रहा आया।
आपके निधन के सोलह वर्ष उपरान्त, विश्व को पता लगा कि आप कितने बड़े वैज्ञानिक थे। सन् १९०० में तीन
यूरोपीय वैज्ञानिकों को उस भूले हुए लेख का पता चला था, जिसे आपने ३० वर्ष पूर्व प्रकाशित किया था। उन्होंने उसकी महत्ता को जान
लिया और उसका समाचार वैज्ञानिक दुनियां में फैला दिया। वैज्ञानिक शीघ्र ही इस निष्कर्ष पर पहुंच गए कि आप के नियम केवल
पौधों के लिए ही नहीं, जंतुओं एवं मानवों के लिए भी सही हैं। बाद के प्रयोगों से पता चला कि आपके
नियमों के कुछ अपवाद भी हैं। अब हम उन्हें आपके नियम नहीं कहते, बल्कि आपके सिद्धान्त कहते हैं। आपके सिद्धान्त कृषकों के लिए बहुत सहायक
सिद्ध हुए हैं। उन्होंने कृषकों को बताया है कि गेहूं, मक्का
और दूसरी फसलों की अच्छी किस्में कैसे तैयार की जा सकती हैं। इन्ही सिद्धान्तों पर
चलकर, पशु उत्पादक अधिक मजबूत, स्वस्थ
गाएं और भेड़ों को पैदा करने में सफल हुए हैं। आधुनिक चिकित्सा वैज्ञानिक आपके
सिद्धान्तों के आधार पर यह पता लगाने का प्रयत्न कर रहे थे कि क्या लोगों का कुछ
रोगों की ओर आनुवंशिक रुझान होता है और यदि ऐसा होता है, तो
क्या ऐसी आनुवंशिकता को नियंत्रित किया जा सकता है। इस सिद्धान्त के लिए हम आपके
चिर ऋणी रहेंगे।
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